पटना: बिहार की सियासत में इन दिनों एक ऐसी पहेली चल रही है जिसे सुलझाने में बड़े-बड़े धुरंधर फेल हो रहे हैं। सवाल सीधा है- नीतीश कुमार के बाद बिहार की गद्दी पर कौन बैठेगा? चौक-चौराहों से लेकर ड्राइंग रूम तक बस इसी 'पॉलिटिकल पजल' की चर्चा है।
हर कोई अपने तर्क और राजनीतिक समझ से उत्तर ढूंढ रहा है, लेकिन असली जवाब सिर्फ भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के पास है। हाल ही में पटना के एक पार्क में सुबह की सैर के बाद कुछ प्रोफेसरों के बीच हुई चर्चा ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। डेटा एनालिसिस और राजनीति के माहिर 'प्रोफेसर साहब' ने भाजपा के पुराने पैटर्न को डिकोड करते हुए चार ऐसे नाम बताए हैं, जिनकी चर्चा मीडिया की हेडलाइंस में भी नहीं है।
सम्राट चौधरी का नाम सिर्फ 'हवा-हवाई'?
चर्चा के दौरान जब डॉ. अभय कांत ने प्रोफेसर विजय मोहन से पूछा कि सीएम की रेस में कौन आगे है, तो प्रोफेसर ने मुस्कुराते हुए कहा कि मीडिया में सम्राट चौधरी का नाम बहुत ज्यादा उछाला जा रहा है, जिसे 'ओवररेटेड स्पेकुलेशन' कहा जा सकता है। प्रोफेसर का तर्क है कि भाजपा कभी भी मीडिया कवरेज के आधार पर इतनी बड़ी नियुक्ति नहीं करती। भाजपा का पिछला रिकॉर्ड देखें तो वह हमेशा चौंकाने वाले फैसले लेती है। जब पार्टी के बड़े नेता भी अंदाजा नहीं लगा पा रहे, तो मीडिया का दावा महज एक अनुमान है। भाजपा का टॉप ब्रैकेट पूरी तरह से 'अनप्रेडिक्टेबल' यानी अप्रत्याशित है।
बीजेपी का 'लो-प्रोफाइल' और 'हार्ड वर्किंग' फॉर्मूला
प्रोफेसर विजय मोहन ने भाजपा के चयन के पैटर्न को समझाते हुए मध्य प्रदेश और हरियाणा का उदाहरण दिया। एमपी में शिवराज सिंह चौहान जैसे कद्दावर नेता के होते हुए मोहन यादव को चुना गया, जो एबीवीपी से आए थे और लाइमलाइट से दूर थे। ठीक वैसा ही हरियाणा में हुआ, जहां एक साधारण कार्यकर्ता नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। भाजपा अब उन नेताओं को पसंद करती है जो शैक्षणिक रूप से मजबूत हों, अपनी विचारधारा के प्रति समर्पित हों और जिनकी छवि एक 'कॉमन मैन' की हो। बिहार में भी पार्टी किसी ऐसे ही चेहरे को मौका दे सकती है जो वर्तमान में किसी सदन का सदस्य हो भी सकता है और नहीं भी।
अति पिछड़ा वर्ग से प्रोफेसर की पसंद के दो नाम
जातीय समीकरणों और भाजपा के चयन के मापदंडों (शिक्षा, बेदाग छवि और विचारधारा) को ध्यान में रखते हुए प्रोफेसर ने दो नाम उछाले हैं। पहला नाम प्रेम कुमार का है, जो अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं और 9 बार के विधायक रह चुके हैं। उनकी योग्यता और अनुभव उन्हें इस दौड़ में फिट बैठता है। दूसरा चौंकाने वाला नाम मधुबनी के खजौली से विधायक अरुण शंकर प्रसाद का है, जो वैश्य समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और भाजपा की 'साइलेंट वर्कर' वाली छवि में सटीक बैठते हैं।
दलित चेहरे पर भी दांव खेल सकती है भाजपा?
अगर भाजपा बिहार में किसी दलित चेहरे को आगे करने की सोचती है, तो प्रोफेसर साहब ने दो और नाम सुझाए हैं। सीतामढ़ी के बथनाहा से विधायक अनिल कुमार, जो बीआईटी मेसरा से पढ़े हुए सिविल इंजीनियर हैं। उनका प्रोफाइल भाजपा के 'शिक्षित और लो-प्रोफाइल' वाले सांचे में बिल्कुल फिट बैठता है। इसके अलावा पूर्णिया के बनमनखी से विधायक कृष्ण कुमार ऋषि भी पार्टी की गुडबुक में शामिल हैं। प्रोफेसर का मानना है कि बिहार की जटिल जातीय राजनीति को देखते हुए किसी सवर्ण को मौका मिलना मुश्किल लग रहा है, क्योंकि भाजपा अब समय की धारा के साथ सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटी है।
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