कोर्ट का यह रुख हमारी उस धरती और पर्यावरण के प्रति गहरी संवेदना को दर्शाता है, जो लगातार बढ़ते प्रदूषण और कचरे के बोझ से कराह रही है। पीठ ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को इस मामले में अब तक हुई प्रगति का हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
कोर्ट का मानना है कि ठोस कचरे के कुप्रबंधन और प्रदूषण से पर्यावरण को जो आघात पहुंचता है, उसकी भरपाई केवल कागजी दावों से नहीं, बल्कि ठोस और पारदर्शी व्यवस्था से ही संभव है।
'मुआवजा सजा नहीं, पर्यावरण की क्षतिपूर्ति है'
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पर्यावरण मुआवजा किसी दंड या जुर्माने का विकल्प नहीं हो सकता। यह मूल रूप से 'पुनर्स्थापनात्मक' प्रकृति का है, जिसे दोषी को सामान्य जुर्माने के अतिरिक्त चुकाना होगा। इसका उद्देश्य प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में वापस लाना है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक पर्यावरण को हुए नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो जाती, तब तक मुआवजा चुकाने की जवाबदेही बनी रहेगी। संवेदनशील नजरिये को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा कि मुआवजा तय करते समय प्रदूषण के वास्तविक प्रभाव के साथ-साथ संभावित खतरों को भी आंका जाना चाहिए।
इसके लिए प्रदूषण फैलाने वाले की आर्थिक क्षमता, नुकसान के आकलन की लागत और पर्यावरण को पुनर्जीवित करने में आने वाले खर्च को आधार बनाया जाना चाहिए।
संस्थागत जवाबदेही और नियमों का कड़ाई से पालन
कोर्ट ने अमरावती नगर निगम की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह रेखांकित किया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए केवल मजबूत कानून होना ही काफी नहीं है, बल्कि उनकी प्रभावी मैकेनिज्म और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। कोर्ट ने पर्यावरण कानूनों के तहत गठित निकायों के कागजों तक सीमित रहने के बजाय जमीन पर सक्रिय रूप से काम करने की आवश्यकता पर बल दिया।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने सालिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 के नियम 18 के तहत 'केंद्रीय कार्यान्वयन समिति' के गठन की सराहना की। कोर्ट की यह पहल इस बात की गवाही देती है कि न्यायपालिका हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, हरित और सांस लेने योग्य पर्यावरण सुनिश्चित करने के वास्ते कितनी प्रतिबद्ध है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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