देश के महानगरों और विकासशील शहरों में स्मार्ट सिटी (Smart City) और चमचमाती बुनियादी सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन हर साल मानसून इन दावों की पोल खोलकर रख देता है।
हाल के दिनों में सामने आई दो दर्दनाक घटनाएं—कभी रियांश तो कभी चारु का खुले नालों में बह जाना—यह साबित करने के लिए काफी हैं कि लापरवाही का यह जानलेवा सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ये मासूम बच्चे सिर्फ पानी के तेज बहाव में नहीं बह रहे हैं, बल्कि नगर निगमों, स्थानीय प्रशासन और हमारे पूरे सिस्टम की उस संवेदनहीनता को उजागर कर रहे हैं जो बार-बार चेतावनियों के बावजूद नींद से जागने को तैयार नहीं है।
मासूम जिंदगियों का अंत: लापरवाही की भेंट चढ़ते रियांश और चारु पिछले दिनों अलग-अलग हादसों में खुले और उफनते नालों ने मासूम बच्चों को लील लिया। बारिश के दौरान सड़क पर भरे पानी के कारण यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि सड़क कहां खत्म हो रही है और जानलेवा खुला नाला कहां से शुरू हो रहा है। रियांश और चारु जैसी मासूम जिंदगियां खेलते-खेलते या राह चलते अचानक इन मौत के कुओं में समा गईं। जब तक प्रशासन हरकत में आता और सर्च ऑपरेशन (Search Operation) शुरू होता, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इन हादसों ने न सिर्फ पीड़ित परिवारों को जिंदगी भर का गम दिया है, बल्कि आम नागरिकों के मन में भी यह खौफ पैदा कर दिया है कि क्या उनके बच्चे अपने ही घर के बाहर सुरक्षित हैं?
बजट, कागजी वादे और जमीनी हकीकत: आखिर जिम्मेदार कौन? हर साल मानसून से ठीक पहले ड्रेनेज की सफाई, नालों को कवर करने और सुरक्षा जाल लगाने के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट पास किया जाता है। कागजों पर टेंडर जारी होते हैं और समीक्षा बैठकें होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत जस की तस बनी रहती है। शहरों में ऐसे सैकड़ों प्वाइंट्स हैं जहां बड़े नाले बिना किसी बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड या ढक्कन के खुले पड़े हैं। अधिकारियों की दलील होती है कि जलभराव और भारी बारिश के कारण दबाव बढ़ गया था, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन संभावित खतरों का आकलन मानसून से पहले नहीं किया जाना चाहिए था? क्या किसी मासूम की जान जाने के बाद ही प्रशासन की आंखें खुलेंगी?
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