त्रिपुरा हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणी करने वाली कंटेंट क्रिएटर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द करने से इनकार कर दिया है।
अदालत ने कहा कि प्रधानमंत्री देश में एक उच्च संवैधानिक पद पर हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक आलोचना की जगह है, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी के खिलाफ अभद्र, मानहानिकारक या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल गैरकानूनी है।
जस्टिस टी अमरनाथ गौड़ और जस्टिस एस दत्ता पुरकायस्थ की पीठ ने त्रिपुरा पुलिस की ओर से दर्ज एफआईआर और दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त करने के साथ-साथ इसका इस्तेमाल साइबर मानहानि के लिए भी किया जा रहा है।
एफआईआर में पीएम और मेयर के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का जिक्र
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत के सामने रखी गई एफआईआर की सामग्री का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने प्रधानमंत्री और राज्य के मेयर के खिलाफ कथित तौर पर ऐसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, जिनसे उन्हें वैश्विक स्तर पर बदनाम करने का इरादा नजर आता है।
मामला कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती की ओर से दायर दो याचिकाओं से जुड़ा है। उन्होंने ईस्ट अगरतला और वेस्ट अगरतला पुलिस थानों में दर्ज एफआईआर और दोनों मामलों में दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी।
शिकायतों के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित तौर पर अभद्र, अपमानजनक और आलोचनात्मक भाषा का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा अगरतला के मेयर और माता त्रिपुरेश्वरी को लेकर भी कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं।
इन आरोपों के सिलसिले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। हाईकोर्ट ने 7 जनवरी को उन्हें अंतरिम जमानत दी थी। बाद में दोनों मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई और 13 फरवरी को उन्हें स्थायी जमानत मिल गई।
याचिकाकर्ता ने कहा- ये सिर्फ विचार व्यक्त करना था
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की दलील थी कि एफआईआर में आपराधिक मानहानि के लिए जरूरी तत्व सामने नहीं आते। उनका कहना था कि उनके बयान महज राय या विचार की अभिव्यक्ति थे, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण प्राप्त है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ शुरू की गई कानूनी कार्रवाई राजनीतिक रूप से प्रेरित थी।
वहीं, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां कीं। साथ ही माता त्रिपुरेश्वरी को लेकर आपत्तिजनक बयान देकर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई। राज्य का कहना था कि जांच के दौरान प्रथमदृष्टया मामला सामने आया है और इसका फैसला मुकदमे के दौरान होना चाहिए, न कि कार्यवाही को रद्द करके।
अभिव्यक्ति की आजादी अभद्र कंटेंट की छूट नहीं: हाईकोर्ट
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है, लेकिन सोशल मीडिया पर मानहानिकारक, अभद्र या दुर्भावनापूर्ण सामग्री प्रकाशित करने को इसका संरक्षण नहीं मिलता।
पीठ ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का लाइसेंस नहीं है। ऑनलाइन झूठे बयान फैलाने पर कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। अदालत के मुताबिक, झूठे दावे पोस्ट करना, दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाना या अपुष्ट आरोप साझा करना सिविल हर्जाने के मुकदमे या आपराधिक कार्रवाई की वजह बन सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि आधुनिक दौर में सोशल मीडिया लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। इसका इस्तेमाल संवाद करने, जानकारी साझा करने और एक-दूसरे से जुड़ने के लिए किया जाता है। लेकिन सोशल मीडिया पर गलत जानकारी तेजी से फैल सकती है और कम समय में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है।
पीएम और मेयर की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का आरोप
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के बयानों में प्रधानमंत्री और मेयर के नाम और सरनेम का मजाक उड़ाते हुए उनकी आलोचना की गई थी। अदालत के अनुसार, कुछ टिप्पणियों से माता त्रिपुरेश्वरी की पूजा करने वाले राज्य के लोगों की भावनाएं भी आहत हुईं।
पीठ ने माना कि इस तरह के बयान मानहानि की श्रेणी में आ सकते हैं। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ताओं के पास मानहानि के लिए कानूनी उपाय अपनाने का अधिकार बना हुआ है। उसके मुताबिक, ऐसे बयानों से प्रधानमंत्री और राज्य के मेयर की व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की बात सामने आती है और यह मानहानि का मामला बन सकता है। इस आधार पर त्रिपुरा हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में दर्ज एफआईआर और आगे की कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।
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