Supreme Court News: संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक अहम फैसला सुनाया गया. मध्य प्रदेश के एक जमीन विवाद के मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष न्यायालय ने साफ किया कि राजस्व रिकॉर्ड में केवल नाम जोड़ देने या हटा देने से मालिकान हक नहीं बदल जाता है.
न्यायालय ने साफ किया कि किसी भी संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला सिर्फ राजस्व रिकॉर्ड के अधार पर नहीं किया जा सकता है. इसके लिए दूसरे सबूतों को भी देखना होगा.
दरअसल, एक मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले को भी पलट दिया, जिसमें राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़े विवाद का फैसला किया जाए.
कोर्ट ने समझाए राज्यव रिकॉर्ड के मायने?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज करने की प्रक्रिया मुख्य रूप से जमीन से जुड़े राजस्व यानी लगान वसूली के लिए की जाती है. नामांतरण मात्र से ही किसी व्यक्ति के पक्ष में संपत्ति का मालिकाना हक पैदा नहीं होता है. इसके साथ ही किसी दूसरे व्यक्ति का मिलिकाना हक समाप्त नहीं होता है.
शीर्ष न्यायालय ने यह भी साफ किया कि नायब तहसीलदार के केवल एक आदेश पर राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव संभव है. हालांकि, केवल किसी एक व्यक्ति का नाम दर्ज कर देने भर से वह आदेश संपत्ति के मालिकाना हक को नहीं बदल सकता है. इसको बदलने के लिए अन्य रिकॉर्ड और प्रमाणों को देखना ही होगा.
'दूसरे सबूतों को भी देखना जरूरी'
टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि को केवल एक सबूत के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि, इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि इसे मालिकान हक का अंतिम प्रमाण बिल्कुल नहीं माना जाना चाहिए. इस रिकॉर्ड को केवल एक सबूत के तौर पर देखा जाना चाहिए.
मध्य प्रदेश के जमीनी विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 117 के अंतर्गत राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि को सही मामने की कानूनी धारणा को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता है. इसको दूसरे सबूतों से गलत भी साबित किया जा सकता है.
'म्यूटेशन से मालिकाना हक नहीं जाता'
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी अचल संपत्ति पर व्यक्ति का अधिकार केवल इसलिए नहीं समाप्त हो जाता, क्योंकि राजस्व रिकॉर्ड में किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज है. जिस भी व्यक्त को इस आधार पर संपत्ति पर दावा करना है, उसको कुछ अन्य सबूतों को भी प्रदर्शित करना होगा.
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति का वास्तविक मालिकाना हक तय करने का अधिकार केवल सिविल कोर्ट के पास है. राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना केवल मालिकाना हक के आधार के लिए एक सबूत हो सकती है, लेकिन वह खुद मालिकाना हक नहीं तय करती.
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