- मोहसिना किदवई : जब 'विमान अपहरण' मामले में जुड़ गया था नाम, कॉमन सेंस ने दिखाई थी राह | दैनिक सच्चाईयाँ

Friday, 10 April 2026

मोहसिना किदवई : जब 'विमान अपहरण' मामले में जुड़ गया था नाम, कॉमन सेंस ने दिखाई थी राह

कांग्रेस नेत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई से जुड़े ऐसे कई किस्से हैं, जो राजनीति में उन्हें सादगी और ईमानदारी की दुर्लभ मिसाल साबित करते हैं. लेकिन एक घटना ऐसी है, जो उनकी उस राजनीतिक दूरदर्शिता व समझबूझ का प्रमाण है, जिसने न केवल स्वयं को, बल्कि पूरी कांग्रेस पार्टी को भी अनावश्यक शर्मिंदगी से बचा लिया था.

बात 20 दिसंबर 1978 की है, जब इंदिरा गांधी को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा रहा था. इस वक्त मोहसिना किदवई बतौर उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गन्ना किसानों के साथ एक प्रदर्शन में भाग ले रही थीं. इसी दौरान किदवई को खबर मिली कि उनकी पार्टी के कुछ कथित युवा नेताओं ने इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट नंबर 410 का कथित तौर पर अपहरण कर लिया है. इस बोइंग 737 विमान के 126 यात्रियों में इंदिरा गांधी की पूर्व कैबिनेट के दो सदस्य ए.के. सेन और धर्मवीर सिन्हा भी शामिल थे. विमान लखनऊ से दिल्ली होते हुए कोलकाता जा रहा था.

घटनाक्रम के अनुसार दो युवक, जिनके नाम भोलानाथ पांडेय और देवेंद्र पांडेय थे, अचानक अपनी सीटों से उठे और कॉकपिट की ओर बढ़ गए. हालांकि दोनों पांडेय एक-दूसरे को जानते नहीं थे, लेकिन इंदिरा गांधी के प्रति उनके साझा लगाव ने उन्हें यह कदम उठाने के लिए 'प्रेरित' किया. उन्होंने कैप्टन एम.एन. बट्टीवाला को विमान को दिल्ली के बजाय वाराणसी ले जाने के लिए मजबूर कर दिया. दोनों ने स्वयं को यूथ कांग्रेस का सदस्य बताया था और वे इंदिरा गांधी की बिना शर्त रिहाई की मांग कर रहे थे.

हालांकि शाम तक यह नाटक समाप्त हो गया, जब विमान वाराणसी में उतरा. दोनों युवक, जो वास्तव में किसी हथियार या विस्फोटक से लैस नहीं थे, इंदिरा गांधी के समर्थन में नारे लगाते हुए शांति से विमान से बाहर आए और पुलिस के समक्ष सरेंडर कर दिया. लेकिन इस प्रहसन पर से परदा गिरना तो अभी बाकी था. मसला वहां फंस गया, जब इस वाकये के दौरान एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने मोहसिना किदवई को बताया कि अपहरणकर्ताओं ने कहा है कि वे विमान को तभी छोड़ेंगे, जब किदवई उनसे ऐसा करने को कहेंगी. यह सुनकर किदवई स्तब्ध रह गईं. उन्होंने अधिकारी से दो टूक कहा कि वे इन अपहरणकर्ताओं को जानती तक नहीं हैं.

यह बात देखने-सुनने में बहुत साधारण सी नजर आ रही थी, लेकिन इसके नतीजे दूरगामी निकल सकते थे. कांग्रेस की एक वरिष्ठ नेता का विमान अपहरण जैसे आपराधिक मामले से कथित जुड़ाव पूरी पार्टी की छवि पर अमिट धब्बा लगाने के लिए काफी था. इस समय कुछ विधि विशेषज्ञों ने किदवई को अग्रिम जमानत लेने की सलाह दी. लेकिन किदवई ने इससे इनकार कर दिया. उन्होंने बाद में कहा था कि उनके पास भले ही कानून की डिग्री न थी, लेकिन उनकी सामान्य समझ ने उन्हें सही रास्ता दिखाया. उन्होंने अपने वकीलों से कहा कि अग्रिम जमानत की अर्जी देना दोष स्वीकार करने जैसा होगा और इससे उनका नाम अपहरणकर्ताओं से जुड़ जाएगा. इस तरह उन्होंने यह कठिन फैसला लेकर न केवल खुद को, बल्कि स्वयं से भी ज्यादा पार्टी को भी उस शर्मिंदगी से बचा लिया, जिसके साथ उनका या पार्टी का कहीं से कहीं तक नाता नहीं था.

सादगी ऐसी कि खुद के नाम पर मकान तक नहीं

किसी बड़े विवाद में मोहसिना किदवई का नाम आने के इस मामले को अपवादस्वरूप ही माना जाना चाहिए, अन्यथा छह दशकों का उनका सियासी कॅरियर और सार्वजनिक जीवन बेहद शांत और गरिमापूर्ण रहा. मोहसिना किदवई के राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1960 में हुई थी, जब वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लिए चुनी गईं. उस समय उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष थी. अवध के एक पारंपरिक और कुलीन मुस्लिम परिवार से आने वालीं किदवई को 1978, 1980 और 1984 में लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतने का गौरव हासिल हुआ. वे पहले इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी की कैबिनेट में काबीना मंत्री रहीं. उनकी आत्मकथा 'माय लाइफ इन इंडियन पोलिटिक्स' में उनके राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं की झलक मिलती है

एमएलसी और सांसद के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मोहसिना किदवई की छवि एक ईमानदार और सादगीपसंद जनप्रतिनिधि की रही. मई 2016 में जब उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लिया तो उन्हें इस बात का संतोष था कि वे अपने सार्वजनिक जीवन में यथासंभव काफी कुछ कर सकीं, लेकिन साथ ही एक चिंता भी थी. देश की परिवहन, स्वास्थ्य और आवास मंत्री रह चुकीं इस वरिष्ठ नेता के पास राष्ट्रीय राजधानी या कहीं और भी अपना निजी घर नहीं था. उनके पास सिर्फ बाराबंकी के बड़ागांव में पुश्तैनी जॉइंट प्रॉपर्टी थी. यह इस बात का उदाहरण है कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के वास्तविक मायने क्या होते हैं.

अहम मसलों पर खुलकर रखे विचार……

सियासी तौर पर मोहसिना किदवई की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि वे पार्टी अनुशासन की लक्ष्मण रेखा को पार किए बिना भी अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने से कभी हिचकिचाई नहीं. शाहबानो मामला, अयोध्या विवाद, समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी के साथ कांग्रेस के संबंध, सांप्रदायिक दंगों जैसे अनेक मसलों पर किदवई ने समय-समय पर पार्टी नेतृत्व को कई सलाह दी थी. अगर कांग्रेस नेतृत्व ने किदवई की उन सलाहों पर ध्यान दिया होता तो देश की राजनीति और समकालीन इतिहास कहीं अधिक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ सकता था.

मोहसिना किदवई की ईमानदारी, सादगी और स्पष्टवादिता को लेकर उनकी आत्मकथा 'माय लाइफ इन इंडियन पोलिटिक्स' में सोनिया गांधी ने भी लिखा, 'मोहसिना जी में राजनीतिक विचारधारा के सभी वर्गों और समाज के हर वर्ग के लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने की अद्भुत क्षमता है. उनकी ईमानदारी, सौम्य स्पष्टवादिता, समाज के कमजोर वर्गों के प्रति गहरी चिंता, लोकतंत्र, बहुलवाद और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों में उनका अटूट विश्वास जैसे उनके गुण उनकी आत्मकथा में झलकते हैं.'

Post a Comment

Whatsapp Button works on Mobile Device only

Start typing and press Enter to search

Do you have any doubts? chat with us on WhatsApp
Hello, How can I help you? ...
Click me to start the chat...