सुबह उठते ही मोबाइल, खाना खाते समय स्क्रीन, और रात को सोने से पहले गेम अब बच्चों के खेल के मैदान बन चुके हैं। या यूं कहें कि यहीं बच्चे डिजिटल स्क्रीन के सामने समय बिताने के आदी हो गए हैं।
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि यह बदलाव सिर्फ लाइफस्टाइल का हिस्सा नहीं, बल्कि बच्चों के दिमाग और व्यवहार को अंदर से बदलने वाला डिजिटल डोपामिन ट्रैप बनता जा रहा है। मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग में हुई एक स्टडी में ये सामने आया है।एक्सपर्ट्स का कहना है कि कम उम्र में लगातार स्क्रीन एक्सपोजर बच्चों के ब्रेन डेवलपमेंट को प्रभावित कर रहा है। चिंताजनक बात यह है कि बच्चों में ब्रेन रीवायरिंग जैसे इफेक्ट मिल रहे हैं। मोबाइल और गेम्स से मिलने वाला इंस्टेंट डोपामिन बच्चों को बार-बार उसी ओर खींचता है, जिससे उनका ध्यान, याददाश्त और धैर्य कमजोर हो रहा है। स्कूलों में भी यह समस्या तेजी से सामने आ रही है, जहां बच्चे न केवल पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं, बल्कि सोशल और फिजिकली भी अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं।
कम उम्र में बदल रहा दिमाग
स्टडी रिपोर्ट के अनुसार लगातार स्क्रीन इस्तेमाल से बच्चों के दिमाग में डोपामिन रिवार्ड सिस्टम एक्टिव पाया गया। खासतौर से 6ndash;14 साल के बच्चों में अत्यधिक मोबाइल उपयोग से ब्रेन रीवायरिंग जैसे इफेक्ट मिले। वहीं 8ndash;16 वर्ष के बच्चे डेली एवरेज 5ndash;7 घंटे स्क्रीन पर बिता रहे हैं। जिससे उनके दिमाग की प्रोग्रामिंग पर ही असर आ रहा है।यानी कम उम्र में ही बच्चों का फोकस, मेमोरी और डिसीजन मेकिंग प्रभावित हो रही है।
बच्चों में पाया गया सोशल गैप
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जहां पहले बच्चे मैदानों में खेलते थे,वहीं अब वे वर्चुअल दुनिया में सिमट रहे हैं। उनके जीवन में सोशल गैप आ गया है। दोस्ती और खेल गायब हो गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 4 से 12 साल के ऐसे बच्चे जिनका स्क्रीन टाइम पांच घंटे से अधिक था ऐसे 70 प्रतिशत बच्चों का सोशल इंटरैक्शन कम मिला। 55 प्रतिशत बच्चों का कम्युनिकेशन स्किल्स कमजोर पाया गया। 40 प्रतिशत बच्चों में सोशल आइसोलेशन तेजी से डेवलप हुआ। इन बच्चों की स्कूल में ग्रुप एक्टिविटी से भागीदारी 10 फीसदी ही रही। सबकी फ्रेंड सर्किल की ऑनलाइन गेमिंग फ्रेंड्स जोन इनमें देखा गया।
घट गई फिजिकल एक्टिविटी
डॉक्टर्स ने बताया कि मोबाइल की लत का असर सिर्फ दिमाग पर नहीं, शरीर पर भी देखा गया।बच्चों में मोटापा, कमजोर मसल्स और बॉडी कोऑर्डिनेशन की समस्या काफी मिली।फिजिकल एक्टिविटी लगभग आधी पाई गई। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से इन बच्चों को स्लीप क्वालिटी भी खराब मिली। जिसकी वजह से बच्चों में स्ट्रेस डिसऑर्डर्स भी देखने को मिले।
पहचान का संकट और एडिक्शन
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट बताते हैं कि सोशल मीडिया और गेम्स बच्चों पर एक अदृश्य दबाव बना रहे हैं। बच्चे खुद की तुलना ऑनलाइन इमेज से करने लगे हैं। इससे आइडेंटिटी क्राइसिस, एंग्जायटी और एडिक्टिव बिहेवियर बढ़ रहा है।स्कूलों और क्लीनिक्स में स्क्रीन एडिक्शन के केस तेजी से बढ़ रहे हैं। 10 में से 6 बच्चे किसी न किसी रूप में मोबाइल पर निर्भर हो चुके हैं। पेरेंट्स भी मानते हैं कि बच्चे को शांत रखने के लिए मोबाइल देना अब आम हो गया है, जो आगे चलकर गंभीर समस्या बन रहा है।
समाधान बेहद जरूरी
डॉक्टर्स के मुताबिक इस डिजिटल ट्रैप से बचने के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित करना बहुत जरूरी है। बच्चों की आउटडोर एक्टिविटी को बढ़ावा देना ही होगा। साथ ही फैमिली के साथ बच्चों का क्वालिटी टाइम स्पेंड करना भी जरूरी है। बच्चों को रियल लाइफ इंटरैक्शन के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
हमने बच्चों के व्यवहार में बड़ा बदलाव देखा है। 6 से 14 साल के बच्चों में स्क्रीन टाइम बढ़ने के साथ अटेंशन डेफिसिट, इरिटेबिलिटी और स्लीप डिस्टर्बेंस के केस तेजी से बढ़े हैं।डिजिटल स्क्रीन से मिलने वाला इंस्टेंट डोपामिन बच्चों के दिमाग को उसी पैटर्न का आदी बना देता है, जिससे वे रियल लाइफ एक्टिविटी में रुचि खोने लगते हैं।
डॉ. नवरत्न गुप्ता, एचओडी, बाल रोग विभाग, मेडिकल कॉलेज
डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि एक साइकोलॉजिकल ट्रैप बनते जा रहे हैं।सोशल मीडिया और गेमिंग ऐप्स बच्चों के दिमाग में लगातार रिवॉर्ड साइकल बनाते हैं, जिससे उनमें एडिक्टिव बिहेवियर तेजी से डेवलप होता है।हमारे पास आने वाले कई मामलों में बच्चे सोशल विदड्रॉल, लो सेल्फ-एस्टीम और आइडेंटिटी कन्फ्यूजन से जूझते नजर आ रहे हैं।
डॉ. रवि राणा, न्यूरोसाइकेट्रिस्ट
पेरेंट्स को समझना होगा कि मोबाइल सिर्फ शांत कराने का जरिया नहीं, बल्कि एक साइलेंट डिपेंडेंसी बना रहा है, जिसे समय रहते तोड़ना जरूरी है।अगर समय रहते स्क्रीन टाइम को कंट्रोल नहीं किया गया, तो यह आगे चलकर बिहेवियरल डिसऑर्डर और लर्निंग डिफिकल्टी का कारण बन सकता है।
डॉ. वाघमिता त्यागी, प्रिंसिपल, गार्गी गर्ल्स स्कूल
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